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भारत में मुर्दो से वसूला टैक्स, जानिए इसके पीछे का राज

भारत का एक ऐसा श्मशान घाट…….जहाँ मुर्दे से टैक्स वसूला जाता है, जहाँ जलती चिताओ के बीच सारी रात वेश्याएँ नाचती हैं।

दोस्तों आज हम बात करेंगे भारत के एक ऐसे ही श्मशान घाट की, जहां सालों से मृतकों के पैसे इकट्ठा करने की परंपरा चली आ रही है. इसे अन्य श्मशान घाटों से अलग बनाता है। यहाँ ऐसा क्यों किया जाता है और कौन हैं वो लोग जो मरे हुओं में से मनचाहा पैसा लेते हैं, बिना पैसे दिए चिता में आग न लगाने दें! इसे जानने के लिए हमारे साथ बने रहें इस वीडियो के अंत तक!

दोस्तों काशी में कुल 84 घाट हैं, जिनमें से श्मशान घाट का नाम मणिकर्णिका है। हिंदू धर्म में इस घाट को अंतिम संस्कार के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस श्मशान भूमि के बारे में यह माना जाता है कि यहां जो भी चिता जलाई जाती है, उसकी आत्मा को सीधे मोक्ष मिलता है, इसलिए अधिकांश लोगों की इच्छा होती है कि उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका श्मशान में ही किया जाए। इस घाट पर पहुंचने के बाद ही जीवन का वास्तविक अर्थ पता चलता है। मणिकर्णिका श्मशान भूमि दुनिया का एकमात्र श्मशान घाट है जिसकी चिता कभी ठंडी नहीं होती है, यानी इस श्मशान में लाशें आती रहती हैं और चिता खत्म होने का नाम नहीं लेती। एक चिता की आग तब नहीं बुझती जब दूसरी चिता दाह संस्कार के लिए तैयार हो जाती है।

मणिकर्णिका श्मशान घाट की एक विशेषता यह भी है कि यहां हर साल होली और दूसरी चैत्र नवरात्रि अष्टमी को एक उत्सव मनाया जाता है। चैत्र नवरात्रि सप्तमी की रात वेश्याएं पैरों में घुंघरू बांधकर रात भर नाचती हैं! इस रात मौत के मातम के बीच नाच-गाना होता है! ऐसा माना जाता है कि मोक्ष पाने के लिए वेश्या पूरी रात जलती चिताओं के बीच नृत्य करती है ताकि अगले जन्म में उन्हें ऐसा जीवन न मिले! ऐसा माना जाता है कि नटराज की मूर्ति के साथ जलती चिता के सामने नृत्य करने से इन वेश्याओं को अपने अगले जन्म में इस कलंक से मुक्ति मिल जाएगी।

दोस्तों आपको जानकर हैरानी होगी कि इस श्मशान में शव को चिता पर रखने से पहले टैक्स वसूला जाता है। ऐसा क्यों होता है आइए जानते हैं! दरअसल कहा जाता है कि इस श्मशान घाट पर टैक्स जमा करने की परंपरा करीब तीन हजार साल पुरानी है. प्राचीन काल में इस श्मशान के रख-रखाव की जिम्मेदारी कयामत जाति के लोगों के हाथ में थी। उस समय कयामत जाति के पास रोजगार के लिए और कोई काम नहीं था जिससे वे अपना जीवन यापन कर सकें। इसलिए यहां एक परंपरा शुरू हुई कि जो कोई भी इस श्मशान में श्मशान के लिए आता था, वह कयामत जाति को दान आदि देता था और जो कुछ भी उन्हें दान में मिलता था, उसमें वे अपना जीवन व्यतीत करते थे। लेकिन आजकल यहां के लोगों ने मनचाहा दाम वसूलना शुरू कर दिया है। पुराने समय में यह एक रिवाज था लेकिन आज के समय में यह एक पेशा बन गया है।

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