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घर का पेट पालने के लिए भाई ने चलाया रिक्शा और का ने बेची चूड़ियां, और अब बहन बन गई है कलेक्टर

महाराष्ट्र के नांदेड़ की रहने वाली वसीमा शेख जिन्होंने कई मुश्किलों को झेलते हुए महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन का एग्जाम दिया और उसमे पास होकर समाज की अन्य महिलाओं के लिए मिसाल कायम की है बता दे की उन्होंने न सिर्फ टाॅप किया बल्कि न अपना व परिवार वालों का नाम रोशन किया है।

आपको बताते चले की वसीमा ने महिला टाॅपर्स की लिस्ट में तीसरी रैंक हासिल की थी इसके साथ ही वह उन लोगो के लिए मिसाल बन गई हैं, जो गरीबी या किसी भी परेशानी के चलते बीच में ही हार मान जाते हैं।

पैसों की दिक्कत की वजह से कई अच्छे स्टूडेंट्स अपने सपनो को पीछे छोड़ दूसरे रास्ते अपना लेते है पर सफलता गरीबी या फिर अमीरी नही देखती है। अपने हुनार से बड़ी बड़ी सफलता अपने नाम की। जिसके पास हुनार नही उसने अमीरी में भी कभी कोई सफलता हासिल नही की। ये तो मेहनत ना करने वालो की सोच है।

आपको बता दे की वसीमा शेख को महाराष्ट्र में डिप्टी क्लेक्टर या उप-जिलाधिकारी पद के लिए चुना गया है। वसीमा की तरह चलते हुए इनकी दो छोटी बहनें भी अब सिविल सर्विस की तैयारी कर रही हैं। वसीमा अपने बीते दिनों को याद करते हुऐ कहती है कई मुश्किल भरा रहा ये सफर था पर बचपन में जो संघर्ष किया था, उसी हिसाब से प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी कर रही थी और तो ज्यादा मुश्किल नहीं हुई।

वसीमा अपने परिवार के बारे में बात करती हुई वह कहती है”हम 4 बहन और 2 भाई,माता-पिता के साथ रहते थे। क्योंकि मेरे अब्बा की दिमागी हालत ठीक नहीं है तो घर का पूरा जिम्मेदारी अम्मी के सिर था। वे दूसरे लोगों के खेतों पर काम कर घर का खर्च चलाती थीं।”

ग्रेजुएशन के बाद 2016 में उन्होंने एमपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू की थी और सिविल सेवा की तैयारी के लिए कंसिस्टेंसी के साथ रोज 10-12 घंटे की पढ़ाई करनी होती थी पर गाँव के लोग ताने देते थे और ऊपर से अपने ही समुदाय के लोग विरोध करते थे तब उनके बड़े भाई उन्हें पुणे लेकर आ गएताकि उन्हें पड़ने के लिए एक अच्छा माहौल मिले औरलाइब्रेरी वगैरह की सुविधा मिल सके।

वसीम बताते है की “ज़मीन पर रहकर काम करना मेरा जुनून था, फील्ड वर्क मुझे अच्छा लगता था तो मैंने साथ ही साथ डिप्टी कलेक्टर के लिए पढ़ाई भी जारी रखी। मैने अपनी पढ़ाई को बंद नही किया।”

वसीमा अपनी सफलता का श्रेय भाई और मां को देती हैं उनके अनुसार “अगर भाई मुझे नहीं पढ़ाते, तो मैं इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती। मां ने बहुत मेहनत की। वसीमा नांदेड़ से लगभग 5 किलोमीटर दूर जोशी सख वी नामक गांव में पैदल पढ़ने जाती थीं। डिप्टी कलेक्टर बनीं वसीमा कहती हैं”

 

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